न जाने क्यूँ इस खुश्क उम्र के दौर में एक सच्ची मुस्कराहट से मैं अनजान हो चली थी ..शायद इसीलिए आज एक हंसी मुझे रुसवाईयों में दबे होने का एहसास करा रही है..ये हँसी मुझसे अलग है,हाँ कभी ये मेरे किरदार का हिस्सा थी लेकिन आज ये मुझसे जुदा है ....जैसे कभी मुझमे थी ही नहीं..एक खिलखिलाहट जो खामोश है ,अश्क का दरिया है...हँसते मुखौटो सी वीरान एक जिंदिगी जो गुज़र रही है क्या जाने कब से ..न जाने कब तक..
चेहरे की सिलवटों में दम तोड़ते मसर्रत के लम्हे अब स्याह पड़ चले हैं,हथेलियों की गर्माहट अब अच्छी नहीं लगती..कंपकपाती
उँगलियों से जिंदिगी को टटोलती हूँ ...मालूम है नज़रें फीकी हो चली हैं,दर्द अपनी करवटें बदल रहा है,ये जिस्म कुछ और तकलीफों से फलने लगा है...कभी कभी सांस जाती सी महसूस होती है तो डर सी जाती हूँ ...लेकिन मौत से नहीं ..उन अनकही बातों से जिन्हें अपनों से कहना चाहा है...ज्यादा कुछ नहीं बस इन रिश्तों से जुड़ाव मेरे दर्द की शिद्दत को हवा दे जाता है
दरख़्त सूखने लगे हैं लेकिन परिंदों ने अब तक चहचहाना बंद नहीं किया है...
